नई दिल्ली।। उत्तार प्रदेश चुनाव में दूसरे दलों से जोर आजमाइश कर रही काग्रेस ने चुनाव आयोग के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। कानपुर के जिला निर्वाचन अधिकारी की ओर से राहुल गाधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को हाईकोर्ट में चुनौती देने के साथ ही आयोग के अधिकार क्षेत्र को भी कतरने की तैयारी है। बताते हैं कि एक मंत्रिसमूह आदर्श आचार संहिता को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से हटाने का एजेंडा तैयार कर चुका है। इसकी सुगबुगाहट और विपक्ष के तीखे विरोध के मद्देनजर सरकार ने हालाकि इस रिपोर्ट को पूरी तरह से शरारती बताया, लेकिन यह भी कहा, अगर पार्टिया चाहेंगी तो चुनाव सुधारों के तहत इस पर विचार हो सकता है। वहीं, चुनाव आयोग ने ऐसी चर्चाओं पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह आयोग के अधिकारों में कटौती का प्रयास है। काग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्र्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा ने आचार संहिता उल्लंघन के मामले में चुनाव आयोग को सीधी चुनौती देने के साथ ही यह संकेत देने से गुरेज नहीं किया था कि राजनीति पहले, संयम बाद में। काग्रेस के तेवर तब और तीखे हो गए जब कानपुर के जिला निर्वाचन अधिकारी ने राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया। काग्रेस इसके खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और महासचिव दिग्विजय सिंह ने इसकी घोषणा कर दी है। इतना ही नहीं, सरकार दबे पाव आचार संहिता को चुनाव आयोग के दायरे से हटाने की तैयारी में है। बताया जाता है कि एक मंत्रिसमूह ने इसका खाका भी खींच लिया है। हालाकि, कार्मिक मंत्रालय ने इस बात से इंकार किया कि आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देकर चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती का कोई प्रस्ताव है। वित्ता मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा, मंत्रिसमूह के एजेंडा में ऐसा कुछ नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि यह विचार कहा से आ गया। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, मैं संबंधित मंत्रिसमूह में शामिल हूं, लेकिन मुझे बैठक के एजेंडा के बारे में जानकारी नहीं है। सलमान खुर्शीद ने कहा, जहा तक मैं समझता हूं, यह सहमति हुई कि विस चुनाव के बाद चुनाव सुधारों पर सर्वदलीय विचार विमर्श होगा। कई सुधारों के बारे में आयोग ने खुद ही प्रस्ताव किया है। सर्वदलीय बैठक के मसौदा एजेंडा में आयोग द्वारा जारी निर्देशों को संवैधानिक दर्जा देने का मुद्दा शामिल नहीं है। इसके साथ ही खुर्शीद और काग्रेस ने यह संकेत भी दिया है कि यह असंभव नहीं है। राजनीतिक दलों की ओर से प्रस्ताव आया तो ऐसा किया जा सकता है। काग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी पहले ही पार्टी की मंशा जताते हुए कह चुके हैं कि आचार संहिता को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में फैसले का अधिकार आयोग के पास नहीं, बल्कि कोर्ट के पास होगा। चुनाव आयोग ने अधिकारों में कटौती की चर्चा पर नाराजगी जाहिर की है। मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने सरकार की ऐसी कोशिश की आलोचना करते हुए कहा, वह इसका विरोध करेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह आयोग के अधिकारों में कटौती का प्रयास है। एक बार कोर्ट को यह तय करने का अधिकार मिल जाएगा कि किसी नेता ने आचार संहिता का उल्लंघन किया है, तो मामला कई साल तक चलता रहेगा और दोषी सत्ता सुख उठाता रहेगा। कुरैशी ने कहा, ऐसा कोई भी प्रयास निष्पक्ष चुनाव के लिए ठीक नहीं होगा। जनता भी इसे नहीं मानेगी।
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