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इस तरह आप आत्मज्ञान व आपार सुख की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-12-21 10:59:51.0

इस तरह आप आत्मज्ञान व आपार सुख की अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं

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शरीर की अपेक्षा प्राण सूक्ष्म है और उससे भी अधिक सूक्ष्म है मन और आनंद की अनूभूति। अध्यात्म योग की सहायता से बाह्य वृत्तियों के प्रति चित्त को हटाया जा सकता है और पाया जा सकता है परमानंद। स्वामी चिन्मयानंद का चिंतन..

हमारा भौतिक शरीर स्थूल कोश है। इसके अंदर ही होता है प्राण। शरीर की अपेक्षा हमारा प्राण अति सूक्ष्म होता है, लेकिन प्राण सूक्ष्म होकर भी व्यापक है। दरअसल, जो जितना अधिक व्यापक होता है, उतना ही अधिक वह सूक्ष्म होता है। प्राण की अपेक्षा मन अधिक सूक्ष्म है। जिस प्रकार शरीर की तुलना में प्राण अपने चारों ओर अधिक व्याप्त है, उसी प्रकार मन में उठने वाली चित्तवृत्तियां प्राण की तुलना में अधिक व्यापक हैं। इस प्रकार मन प्राण की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और अंतरंग है। मन, प्राण तथा शरीर की तुलना में हमारे अंदर एक और सूक्ष्म तत्व है, जिसे बुद्धि कहते हैं। बुद्धि से भी अधिक सूक्ष्म है आनंद की अनुभूति, जो अपनी आंखों से देखा, बस वही सत्य है। संभव है कि इस तथ्य को विचारक न मानें। उन्हें यह विचार सारहीन लगे, क्योंकि वे ज्ञान को बुद्धि से जोड़ते हैं।

यदि हम प्रयोगशाला के प्रयोगों को थोड़ी देर के लिए त्याग दें तथा पुस्तकालय में महान लेखकों के विचारों को समझने का प्रयत्न करें कि वास्तविक ज्ञान क्या है, तो हमें आज भी कुछ भिन्न तथ्य दिखाई देंगे। महान लेखक शेक्सपियर ने अपने कई अविस्मरणीय पात्रों की रचना केवल यही दिखाने के लिए की है कि भावनाओं की कोमलताओं से रहित बौद्धिक कुशलता बर्बरता और पशुता की कोटि में आ जाती है। सार यह है कि भौतिक वैज्ञानिकों को छोड़कर सभी कवियों, साहित्यकारों तथा दार्शनिकों व विचारकों ने एक साथ यह कहा है कि सुंदर-शाश्वत विचार तभी प्रस्फुटित होते हैं, जब बुद्धि और हृदय की भावनाओं का समागम होता है।

आध्यात्मिक विकास में भी हृदय के गुणों से परिपूर्ण बुद्धि ही साधक के लिए हितकारी होती है। इसीलिए यह सत्य वेदों में सभी स्थलों पर स्वीकार किया गया है कि चैतन्य तत्व हृदय गुहा में रहता है और स्व-आत्मदर्शन बुद्धि तथा हृदय के सुखद सामंजस्य से ही संभव है।

जो सामान्य जन राग-द्वेष, मोह, लोभ, मद आदि चित्तवृत्तियों के अधीन हैं, उनके हृदय-गुहा में केवल अनमेल विकारों और अनर्थो का ही संग्रह होता रहता है। सांसारिक पुरुष की बुद्धि मोह में फंसकर अपयश प्राप्त करती है तथा अंत में शिथिल हो जाती है। वह चरम सत्य का मनन तथा आत्मा के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर पाने में सक्षम नहीं होती। इसलिए ऐसी बुद्धि को निम्न कहना ही सार्थक है।

यदि आत्मा को समझना कठिन है, तो क्या इसका तात्पर्य यह निकाला जाए कि परम तत्व का ज्ञान होना तथा उसकी प्राप्ति असंभव है! भारतीय दार्शनिक जीवन-दर्शन के कोरे आदर्शवाद से संतुष्ट नहीं होते हैं, इसलिए उन्होंने अपने उपदेशों में यह बताया है कि संसार में कोई ऐसा लक्ष्य नहीं है, जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

अध्यात्म-योग या ध्यान-योग शब्द का प्रयोग उपनिषद में भी हुआ है। इसके माध्यम से चरम लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। योग शब्द की उत्पत्ति धातु युज अर्थात जोड़ने से है। आरंभ में इस धातु का प्रयोग घोड़ों तथा बैलों को जोड़ने में हुआ करता था, बाद में इस शब्द ने पूर्ण शास्त्रीय आकार ग्रहण कर लिया।

आज शारीरिक प्राणायाम आदि क्रियाओं के साथ-साथ ध्यान द्वारा चित्तवृत्ति निरोध को योग कहते हैं। श्री शंकराचार्य ने दोनों अर्थो को मिलाकर कहा है, 'चित्त को बाह्य विषयों से हटाकर आत्मा के ध्यान में लगाना अध्यात्म-योग है।'

कठोपनिषद में जिस रूप में योग शब्द प्रयुक्त हुआ है, इसका अर्थ ध्यान ही है, जबकि पतंजलि के योगसूत्र में बाद में इसके बाह्य स्वरूप अर्थात इंद्रियों के दमन, प्राणायाम, यम, नियम आदि पर अधिक बल दिया गया है। अध्यात्म-योग के बल पर ही आत्मा को ध्यान पर केंद्रित किया जा सकता है। अध्यात्म-योग वह साधन है, जिसमें बाह्य विषयों के प्रति चित्त के आकर्षण को समाप्त करने की कोशिश की जाती है। एकाग्र चित्त की सहायता से न केवल अंत:करण को शुद्ध किया जा सकता है, बल्कि आत्मा को भी ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।

अध्यात्म मार्ग में कई वृत्तियां अवरोध पैदा करती हैं। इन वृत्तियों से बचाने के बाद ही मन को केवल आत्मज्ञान की दिशा में ले जाया जा सकता है। इस कार्य के लिए ही अध्यात्म-योग साधना की जाती है। यह साधना तभी सफल होती है, जब ध्यान करने वाले साधक का मन सभी हीनविकारों से रहित होता है। इस प्रकार के सच्चे साधक को ही आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और परमानंद की अनुभूति प्राप्त करने में सफल हो पाता है।

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