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इससे जीवन में समृद्धि, शांति और प्रसन्नता आती है

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-11-24 08:06:53.0

इससे जीवन में समृद्धि, शांति और प्रसन्नता आती है

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सत्संग किसी भी प्राणी को सन्मार्ग दिखा सकता है। वह मनुष्य हो या पशु-पक्षी, सत्संग के माध्यम से परम पद प्राप्त करता है...

एक बार नारद मुनि महर्षि कश्यप के आश्रम से महर्षि शौनक के आश्रम जा रहे थे। मार्ग में रात्रि प्रवास के दौरान

उन्हें वन में एक वट वृक्ष के नीचे विश्राम करना पड़ा। वे रात भर अपनी वीणा बजाते रहे और नारायण-नारायण

करते रहे। सुबह हुई। हल्का-सा प्रकाश भी होने लगा। उन्होंने देखा कि सामने कुछ दूरी पर बैठा एक श्वान (कुत्ता) अत्यंत तन्मयता के साथ वीणा ध्वनि और नारायण जाप सुन रहा है। नारद जी को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि पशु भी वीणा के संगीत की मधुरता और ईश वंदना की शीतलता को अनुभव कर रहा है। सूर्य पूर्ण रूप से उदित हो चुका था। नारदजी ने सूर्य देव् प्राणाम किया और अपने आगे की यात्रा पर निकल गए। वे स्वभावगत वीणा के तारों को झ्ांकृत करते हुए नारायण-नारायण का जाप भी करते जा रहे थे। जब काफी आगे निकल गए, तो देखा कि वह श्वान भी पीछे-पीछे आ रहा है। वही तन्मयता, वही गहनता उसके चेहरे पर है, जो वट वृक्ष के नीचे थी। एक बार नारद जी का मन हुआ कि इस श्वान को भयभीत करके भगा दिया जाए। दूसरे ही क्षण आत्मा ने उत्तर दिया कि यह गलत होगा। श्वान वीणा के संगीत और नारायण जाप पर मुग्ध है। इसलिए उसे साथ आने से न रोका जाए।

लंबी यात्रा थी, नारद जी को अनेक बार वन या गांवों में प्रवास करना पड़ा। वह श्वान भी उनके साथ रहा। जब

वे शांतायन वन में महर्षि शौनक के आश्रम पहुंचे, तो श्वान भी साथ था। आम्र वृक्ष के नीचे बैठ कर शौनक कुछ लिख रहे थे। नारद जी उनके सामने पहुंचे और नारायण-नारायण कह कर अभिवादन किया। पीछे से भी नारायण-नारायण की आवाज आई। नारद जी आश्चर्यचकित थे कि उनके अभिवादन को किसी ने दोहराया। उनके पीछे खड़े श्वान ने पुन: नारायण- नारायण का उच्चारण किया। महर्षि शौनक अपने आसन से खड़े हो गए। उन्होंने नारदजी से कहा कि अच्छी संगत में पशु भी सात्विक गुणों का विकास कर सकते हैं। यह श्वान ईश भक्ति की सिद्धि को प्राप्त कर चुका है। आप सदा नारायण-नारायण करते हैं, लेकिन आपको वह फल नहीं मिला। इसने अल्पकाल में ही ईश्वर की निकटता को पा लिया। यही कारण है कि यह अपनी स्वाभाविक वाणी का परित्याग कर भक्तों की वाणी बोल रहा है। श्वान सामने आया और महर्षि शौनक और नारद जी के चरणों

के पास बैठ गया। श्वान बोला कि संसार के महान मनीषियों से मैंने नारायण शब्द को सुना और उसे अपनी

आत्मा से जपना आरंभ किया। मेरे मन से विद्वेष, हिंसक प्रवृत्ति और काम वासना उसी समय दूर होती चली गई। आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे मुक्ति का आशीष दें। नारद मुनि बोले, 'प्रिय, आपने मानव जाति से भी महान कार्य किया है। आपको मैं आदरणीय मानता हूं। अपने तप और साधना के बल पर एकत्र शक्ति से मैं आपको यह आशीष देता हूं कि आप सशरीर स्वर्ग की यात्रा करेंगे और वहां पहुंच कर देवस्वरूप हो जाएंगे।'

कहा जाता है कि युधिष्ठिर के साथ स्वर्गारोहण के लिए जाने वाला कुत्ता यही था। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह कहते हैं कि सत्पुरुषों का संग कभी व्यर्थ नहीं जाता। भर्तृहरि का कहना है कि विद्वान सज्जनों की निकटता अज्ञानता दूर करती है। सदा उत्तम ज्ञान, उत्तम चरित्र और उत्तम व्यवहार के व्यक्तियों के पास ही उठना-बैठना चाहिए। इससे जीवन में समृद्धि, शांति और प्रसन्नता आती है।

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