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जब श्रीहरि बन गए पत्थर, और पूजे गए शालिग्राम

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-11-09 10:55:19.0

जब श्रीहरि बन गए पत्थर, और पूजे गए शालिग्राम

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प्राचीन काल में शंखचूड़ नामक दैत्य था। उसकी पत्नी का नाम वृंदा था, वृंदा पतिव्रता महिला थीं। जिसके कारण शंखचूड़ का पराक्रम और तेज और अधिक बलशाली होता गया। इस तरह शंखचूड़ ने देव, मानव पर अत्याचार करते हुए। सभी को युद्ध में जीत लिया।

जब देवराज का स्वर्ग भी उनका न रहा तो सभी देव भगवान विष्णु के पास गए। और उनसे शंखचूड़ के अत्याचारों से मुक्ति के लिए गुहार लगाई। देवताओं ने श्रीहरि को बताया कि शंखचूड़ की पत्नी वृंदा पतिव्रता नारी है। यदि उनका सतीत्व भंग कर दिया जाए तो संभव है शंखचूड़ का पराक्रमी तेज नष्ट हो जाएगा। और उन्हें हराना आसान हो जाएगा।

इस तरह देवताओं ने शंखचूड़ को युद्ध के लिए ललकारा। और वही दूसरी तरफ श्रीहरि शंखचूड़ का छद्म रूप धारण कर वृंदा के पास पहुंचे। वृंदा अपने पति को देख प्रसन्न हो गईं। तभी श्रीहरि ने वृंदा का सतीत्व नष्ट कर दिया। जब यह बात का ज्ञान वृंदा को पता चला कि शंखचूड़ के रूप में स्वयं साक्षात् श्रीहरि हैं और उन्होंने छल से उसका सतीत्व नष्ट किया है।

जब वृंदा का सतीत्व नष्ट हुआ, तब युद्ध भूमि में लड़ रहे शंखचूड़ का पराक्रमी तेज नष्ट हो गया। और वह युद्ध भूमि में मारा गया। इस पूरी घटना का ज्ञान वृंदा को पता चला तो वह काफी क्रोधित और दु:खी हो गईं।

और उन्होंने श्रीहरि को शाप दिया 'जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है, उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे।'

यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गईं। जिस जगह पर वह सती हुई वहां तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। तभी से वृंदा को तुलसी नाम देकर पूजा जाने लगा।

एक अन्य पौराणिक कथा में उल्लेख मिलता है कि, वृंदा ने श्रीहरि को पत्थर बन जाने का शाप दिया था। और इसके विपरीत श्रहरि ने भी वृंदा को वरदान दिया कि, 'यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।'

बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह माना जाता है।

इसीलिए मनाते हैं देवउठनी एकादशी: इस दिन देव जागते हैं। शुभ कार्य जैसे विवाह और भी अन्य शुरू हो जाते हैं। देवउठनी की पूजा में सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं।

इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आवाहन। यह पर्व कार्तिक, शुक्ल पक्ष, एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव मनाया जाता है।

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