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ये हैं वो 5 कारण, इसीलिए मनाते हैं दिवाली

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-10-27 08:13:29.0

ये हैं वो 5 कारण, इसीलिए मनाते हैं दिवाली

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अंधकार से प्रकाश की ओर खुशियां प्रवाहित करते दिवाली के त्योहार की रौनक देखते ही बनती है। यह रौनक आज से नहीं, बल्कि सदियों से निरंतर विद्यमान हैं।

दिवाली कार्तिक माह की अमावस्या के दिन मनाई जाती है। दिवाली से जुड़ी कई किंवदंतियां, पौराणिक कहानियां और ऐतिहासिक कथाओं के ग्रंथ मौजूद है।

दिवाली की संक्षिप्त कथाएं...

पहली कथा: एक साधु था। उसने माता लक्ष्मी की कठोर तपस्या की। लक्ष्मी जी प्रसन्न हुई और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण कर दिया। वरदान पाकर वह साधु राजदरबार में पहुंचा। साधु ने राजा का राजमुकुट नीचे गिरा दिया। यह देख राजा को बहुत गुस्सा आया। लेकिन राजा ने देखा राजमुकुट से एक सांप निकलकर बाहर की ओर चला गया। जान बचाने के उपहार में राजा ने उस साधु को अपना मंत्री बना लिया।

समय गुजरता गया। एक बार साधु मंत्री ने राजमहल में मौजूद सभी को बाहर जाने का आदेश दिया। सभी चले गए। थोड़ी देर बाद राजमहल ध्वस्त होकर गिर गया। साधु पहले से पूर्व घटना देखने का गुण जानता था। यह सोचकर उसे अभिमान हो गया।

अभिमान इतना बड़ गया कि उसने राजमहल में मौजूद श्रीगणेश की मूर्ति को हटवा दिया। अभिमान के आवेश में एक बार साधु मंत्री ने राजा से कहा, महाराज आपके कुर्ते में सांप है। राजा ने कुर्ता उतार दिया। लेकिन कोई सांप नहीं निकला।

राजा इस बात से नाराज हो गया और उसने साधु को मंत्री पद से निष्काषित कर दिया। तब साधु ने पुन: लक्ष्मी जी का तप किया। तब लक्ष्मी जी ने बताया कि साधु को स्वप्न में बताया कि गणेश की मूर्ति को हटाकर गणेश को नाराज कर दिया है। इसलिए उस पर यह विपत्ति आई है क्योंकि गणेश के नाराज होने से उसकी बुद्धि नष्ट हो गई तथा धन या लक्ष्मी के लिए बुद्धि आवश्यक है।

साधु को अपनी गलती का अहसास हो गया और उसने पश्चाताप किया तो अगले ही दिन राजा ने भी स्वत: जेल में जाकर साधु से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी और उसे जेल से मुक्त कर पुन: मंत्री बना दिया। इसलिए लक्ष्मी एवं गणेश दोनों का पूजन एक साथ करना चाहिए। तभी से लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन की परम्परा आरम्भ हो गई।

दूसरी कथा: एक बार एक राजा ने प्रसन्न होकर एक लकड़हारे को एक चंदन का वन (चंदन की लकड़ी का जंगल) उपहार स्वरूप दिया। लकड़हारा ठहरा साधारण मनुष्य! वह चंदन की महत्ता और मूल्य से अनभिज्ञ था। वह जंगल से चंदन की लकड़ियां लाकर उन्हें जलाकर भोजन बनाने के लिये प्रयोग करने लगा।

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