Home » धर्म समाचार » यहां 75 दिन मनाया जाता है दशहरा, नहीं होता रावण का वध

यहां 75 दिन मनाया जाता है दशहरा, नहीं होता रावण का वध

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-10-10 05:20:35.0

यहां 75 दिन मनाया जाता है दशहरा, नहीं होता रावण का वध

Share Post

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाए जाने वाला दशहरा अपनी खासियत की वजह से विश्व प्रसिद्ध है। बस्तर में 75 दिनों तक दशहरा मनाया जाता है जिसमें करीब 34 गांव पूर उत्साह के साथ भाग लेते हैं। यहां रथ खींचने का अधिकार केवल किलेपाल के माडिय़ा लोगों को ही है। हर गांव से परिवार के एक सदस्य को रथ खींचना ही पड़ता है। इसकी अवहेलना करने पर परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए जुर्माना लगाया जाता है।

बस्तर दशहरा में किलेपाल परगना से दो से ढाई हजार ग्रामीण रथ खींचने पहुंचते हैं, इसके लिए पहले घर-घर से चावल नकदी तथा रथ खींचने के लिए सियाड़ी के पेड़ से बनी रस्सी एकत्रित की जाती थी।छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक मनाए जाने वाला दशहरा पूरे विश्व में विख्यात है। इसमें शामिल होने बड़ी संख्या में विदेशों पर्यटक भी पहुंचते हैं।

3 महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारियां

बस्तर दशहरा की ख्याति सबसे लंबे समय तक चलने वाले दशहरा के लिए तो है ही, साथ ही यह एक अनूठा पर्व है, जिसमें रावण का वध नहीं किया जाता। 13 दिनों तक बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी सहित अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। 75 दिनों तक चलने वाले दशहरा की तैयारियां तीन महीने पहले से ही शुरू हो जाती है। माना जाता है कि यहां का दशहरा 500 वर्षो से अधिक समय से परंपरानुसार मनाया जा रहा है। 75 दिनों की इस लंबी अवधि में प्रमुख रूप से काछनगादी, पाट जात्रा, जोगी बिठाई, मावली जात्रा, भीतर रैनी, बाहर रैनी तथा मुरिया दरबार मुख्य रस्में होती हैं।

ऐसे तैयार होता है रथ

बस्तरा दशहरा का आकर्षण होता है यहां लकड़ी से निर्मित होना वाला विशाल दुमंजिला रथ। बताया जाता है कि बिना किसी आधुनिक तकनीक या औजारों की सहायता से एक समयावधि में आदिवासी उक्त रथ का निर्माण करते हैं। फिर रथ को आकर्षण ढंग से सजाया जाता है। रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र सवार होता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब तक राजशाही जिंदा थी, राजा स्वयं सवार होते थे।

बस्तर दशहरे के लिए निर्माण किया गया फूल रथ, चार चक्कों का तथा विजय रथ आठ चक्कों का बनाया जाता है। स्थानीय सिरहासार भवन में ग्राम बिरिंगपाल से लाई गई साल की टहनियों को गड्ढे में पूजा विधान के साथ गाडऩे की प्रक्रिया को डेरी गड़ाई कहा जाता है।

Like Us
Share it
Top