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विजयदशमी :जीवन का सार हैं श्रीराम

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-10-10 03:53:59.0

विजयदशमी :जीवन का सार हैं श्रीराम

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पौराणिक आख्यान से इतर मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो श्रीराम वह संघर्षरत आम आदमी हैं,विजयदशमी के अवसर पर श्रीराम को आम आदमी के संघर्ष के प्रणेता के रूप में देख रही हैं योगिता यादव..




कभी पढ़ाई, कभी नौकरी तो कभी किसी अन्य कारण से अधिकांश युवाओं को जाना पड़ता है अपने घर से दूर। पर क्या घर छूटने के साथ आत्मशक्ति भी छूट जाती है? यदि संकल्प साथ न हो तो यह अवश्यंभावी है। यकीनन डगमगाते आत्मविश्वास को वे संकल्प ही संभालते हैं, जिन्हें साथ लेकर सब घर से निकले हैं। इन्हीं संकल्पों से लड़े जाते हैं उन्नति और अस्मिता के दीर्घ युद्ध। आपसी सहअस्तित्व और सम्मान से निरंतर बढ़ाई जा सकती है संकल्पों की यह शक्ति।
जीवन का सार हैं श्रीराम
श्रीराम आदर्श और भक्ति का ऐसा स्रोत हैं, जो एक बिंदु पर न थमकर धारा बन बहते हैं। सुबह की 'राम-राम' हो या हारे को 'हरिनाम', असल में ये वे भाव हैं जो श्रीराम के चरित्र को एक साधारण व्यक्ति के संघर्ष से जोड़ते हैं। वे किसी महाकाव्य का एक चरित्र भर ही नहीं हैं, आम आदमी के संघर्ष के प्रणेता हैं। जहां न्यूनतम संसाधनों के साथ जूझना होता है भविष्य की राह में आने वाले तमाम संकटों से। आसपास के छोटे-छोटे सपोर्टल के साथ कैसे जीते जाते हैं अस्तित्व की स्थापना के बड़े युद्ध, श्रीराम यही सिखाते हैं। वे सेना लेने वापस अयोध्या नहीं लौट पड़ते, बल्कि अपने आसपास से ही नई सेना का निर्माण करते हैं। वे लोग जिनकी कर्मभूमि, जन्मभूमि से बहुत दूर है, वे अक्सर एक तरह के अवसाद से घिर जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे अपने घर में होते तो हर समस्या का समाधान हो जाता। यह कल्पना कुछ हद तक सही हो सकती है परंतु पूर्णत: नहीं। प्रति पल छूटी ऊर्जा को याद करने से बेहतर है अपने आसपास से ही नई ऊर्जा का संचयन कर खुद को मजबूत बनाकर आगे बढ़ना।
अनवरत संघर्ष है जीवन
भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी सरिता कुमारी इन दिनों मलेशिया में हैं। पहले पढ़ाई, फिर नौकरी, शादी और अब बच्चे की परवरिश के दौरान कई ऊबड़-खाबड़ रास्तों को पार करना पड़ा। अपनी व्यावहारिकता को अपनी असल शक्ति मानने वाली सरिता कुमारी कहती हैं, 'जीवन अनवरत चलने वाला संघर्ष है। कई बार संघर्ष की दिशा हमारी इच्छा से चुनी हुई होती है और कभी बिल्कुल ही अप्रत्याशित। स्थिति चाहे जिसकी उपज हो, उससे निपटने की ऊर्जा अपनी इच्छाशक्ति से आती है। कई बार दौर इतना कठिन होता है कि किसी का भी सपोर्ट नहीं मिल पाता। परिजन, परिचित और मित्र सभी इतने दूर होते हैं कि चाहकर भी उनसे मदद नहीं मिल पाती। ऐसे हालात में अंतत: अपनी जिजीविषा, आंतरिक ऊर्जा ही साथ देती है। घबराने या परेशान होने से कुछ भी हासिल नहीं होता, उलटे हालात और कठिन हो जाते हैं। ऐसे में ठंडे दिमाग से, शांति और धैर्य से लिया गया निर्णय ही साथ देता है। अब जब औरतें घर की दहलीज पार कर बाहर की दुनिया में अपनी एक नई पहचान बनाने की जद्दोजहद में दिनरात जूझ रहीं हैं, तो उन्हें कठिन हालात से बार-बार जूझना ही पड़ता है और कई बार बिल्कुल अकेले। कई बार कार्यालय, परिवार एवं बच्चों की जरूरतें ऐसा कठिन दबाव पैदा करती हैं कि बिना किसी सकारात्मक संबल के भावनात्मक एवं मानसिक रूप से हम सब ही टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं। ऐसे में एक बात सदैव याद रखनी चाहिए कि यह हमारी चुनी राह है। नहीं भी चुनी है तब भी यह एक और परीक्षा है। अवसाद के कुएं में फिसलते हुए विश्वास और आशा की मजबूत डोर हमें खुद ही गूंथनी है और उसी के सहारे खुद ही बाहर भी निकलते जाना है। यह न सोचें कि यह सिर्फ हमारे साथ ही क्यों हो रहा है, हम ही क्यों? इस नकारात्मक सोच से पूरी ताकत से लड़ते हुए, सोच बदलने की कोशिश करिए। योग, मेडिटेशन या कोई पसंदीदा काम करें, जिसे करके खुशी मिले। अपने आसपास के लोगों से मन की उहापोह बांटिए। अधिकांशत: हमारे आसपास के लोग नाते-रिश्तेदारों से अधिक मददगार साबित होते हैं, क्योंकि हमारे निकट, हमारे हालात से परिचित लोग बेहतर तरीके से हमारी मदद करने की स्थिति में होते हैं।'
सुविधा का लाभ लेना सीखें
इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने दिल्ली आए थे नीरज कौल। आज अच्छी नौकरी और परिवार के साथ सुखमय जीवन बिता रहे हैं। यह राह इतनी भी आसान नहीं थी। अपने संघर्षपूर्ण सफर को बयां करते हुए वे कहते हैं, 'इंजीनियरिंग करना चाहता था लेकिन घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसके लिए मैंने एजुकेशन लोन लेकर पढ़ाई का मन बनाया। मन में धुकधुकी सी लगी रहती थी कि हजारों युवा इंजीनियरिंग करते हैं, पता नहीं अच्छी नौकरी मिल भी पाएगी या नहीं। यही डर मेरी शक्ति बना। मैंने मन लगाकर पढ़ाई की और अच्छी नौकरी पाई। लोन भी चुकता किया। घरवालों का दबाव बना शादी के लिए, वे अपनी ही कम्युनिटी की लड़की से मेरी शादी करवाना चाहते थे लेकिन मैं ऐसी लाइफ पार्टनर चाहता था, जो मेरे संघर्ष को भी समझे। रिश्तेदारों के लाए रिश्ते की बजाए हमने मेट्रीमोनियल एजेंसी से संपर्क कर अपने ही समुदाय की लड़की ढूंढी। वह खुद भी मेरी ही तरह नौकरीपेशा है और संघर्ष को समझती है। आप हंसेंगे लेकिन हमने शादी के लिए भी लोन लिया, जिसको दोनों मिलकर चुकता कर रहे हैं। यहां सभी सुविधाएं हैं, जरूरत है तो बस पूरी ईमानदारी से इनका लाभ लेने की। मैंने समझदारी और हिम्मत दोनों दिखाई और तकनीक ने मेरे सपने सच करनेल में मेरी मदद की।'

कहां चल पाएंगे इन बिन
प्रख्यात कवयित्री पद्मश्री पद्मा सचदेव ने अपने लेखकीय जीवन में लंबा संघर्ष किया। जम्मू जैसे पारंपरिक समाज से निकलकर महानगर में अपनी पहचान स्थापित की। उनके जीवन में दोहरा संघर्ष था। निजी जीवन में भी उन्हें कईल तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा पर इन्हीं संघर्षों ने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति भी दी। अपने जीवन में दोस्तों के साथ-साथ उन्होंने उन छोटे-बड़े सहायकों का भी आभार माना है, जिन्होंने समय-समय पर उनकी मदद की। अपनी किताब 'इन बिन' में वे उनका नाम सहित उल्लेख करती हैं। पद्मा सचदेव कहती हैं, 'हम जब बड़े लोगों और बड़े पुरस्कारों की भीड़ में खड़े होते हैं तो उन लोगों को लगभग भुला ही देते हैं, जिन्होंने छोटी-छोटी लेकिन जरूरी मदद से हमें यह विश्वास दिलाया कि आप निश्चिंत होकर आगे बढ़िए। ये छोटेछोटे सहायक हैं, घरेलू कामों में हाथ बंटाने वाली नौकरानियां, ड्राइवर, माली और कभी-कभी तो चाय का कप पकड़ाने वाला वह अनजान बच्चा, जो आपके सफर की थकान उतार देता है। एक आत्मनिर्भर महिला होने के नाते मैं मानती हूं कि इन बिन जीवन चला पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था।'
तब बनता है ह्यूमन एंगल
स्वामी अंतर नीरव पुंछ के दूरदराज इलाके के रहने वाले हैं। खेती-किसानी से भी जुड़े हैं और जड़ी-बूटियों से भी। घर से दूर बाहर पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों की काउंसलिंग करते हैं और अपनी तेज तर्रार पहाड़ी कविताओं के बूते देशभर में जाने जाते हैं। वे कहते हैं, 'राम का घर से निकलना ही उन्हें श्रीराम बनाता है। उनके इस सफर में शबरी और अहिल्या से लेकर वे आदिम जातियां भी सहयोग करती हैं, जिनकी महत्ता अभी तक उपेक्षित की जा रही थी। महान कवि लार्ड अल्फर्ड टेनीसन ने कहा है कि 'आई हेव बीकम ऑल देट आई हेव मेट' अर्थात मैं जिनसे भी मिला उन जैसा हो गया। अलग-अलग संस्कृतियों, जातियों के लोगों से मिलना ही व्यक्ति को विस्तार देता है। गांव या मोहल्ले के बचपन के दोस्त सभी को याद आते हैं लेकिन वे एक ही मानसिकता और परिवेश के लोग हैं। स्वाभाविक है, उनसे मतभेद बहुत कम होगा। आप जब अलग-अलग माइंडसेट के लोगों से मिलते हैं तभी आप वैचारिक रूप से आगे बढ़ते हैं। असल में तभी हम दूसरों को भी इंसान समझना शुरू करते हैं। जब अतीत के पुल तोड़कर आते हैं तब आपको आगे ही बढ़ना है। पीछे लौटने का कोई विकल्प नहीं है। जो है वह यहीं से अर्जित करना है, यही गुरिल्ला तकनीक है। मौजूदा संसाधनों का इस्तेमाल कर आगे बढ़ना। जब नए माहौल में नए रिश्ते कायम होते हैं, नए दोस्त बनते हैं। तब सही मायने में ह्यूमन एंगल विकसित होता है। सही मायने में जीवन में विजयदशमी होती है।

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