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कब से मनाया जाने लगा नवरात्रि का त्‍यौहार...........

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2016-10-06 09:40:26.0

कब से मनाया जाने लगा नवरात्रि का त्‍यौहार...........

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ऐसी मान्‍यता है कि यदि आप सबकुछ ठीक से करते हैं, तो आप जिस इच्‍छा की पूर्ति के लिए चण्‍डीपाठ करते हैं, वह इच्‍छा नवरात्रि के दौरान पूर्ण हो जाती है।

नवरात्रि का त्यौहार मनाने से सम्बंधित बहुत सारी पौराणिक कहानियां, कथाऐं व घटनाऐं हैं और ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ श्री लंका पर चढाई करने से पहले समुद्र तट पर किया था ताकि वे श्रीलंका के राजा रावण पर विजय प्राप्त कर सकें और नौ दिन तक मां दुर्गा की शक्ति उपासना करने के बाद दसवें दिन उन्होंने लंका विजय के लिए प्रस्थान किया था, जिसमें अन्तिम रूप से उनकी विजय हुई थी और माना जाता है कि तभी से असत्य, अधर्म पर सत्य व धर्म की जीत काे, पर्व दशहरा के रूप में मनाया जाता है और दशहरे से पहले के नौ दिनों को नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। इस संदर्भ में भगवान श्री राम की कहानी भी कम रोचक नहीं है।जिसके अन्तर्गत महिषासुर नाम के एक असुर का माता दुर्गा द्वारा वध किया जाता है। कथा कुछ इस प्रकार है कि-

एक बार दैत्यराज महिषासुर ने कठोर तप करके देवताओं से अजैय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। फलस्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देव-दानव युद्ध के दौरान देवताओं और राक्षसों में सौ वर्ष तक छलबल और शक्ति बल से युद्ध चलता रहा। राक्षसों का राजा महिषासुर नाम का दैत्य था, जबकि देवताओं के राजा इंद्र थे। इस युद्ध में कई बार देवताओं की सेना राक्षसों से पराजित हो गई। एक समय ऐसा आया, जब देवताओं पर विजय प्राप्त करके महिषासुर ने इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया।


जब सभी देवता पराजित हो गए, तो वे ब्रह्मा जी के नेतृत्व में भगवान विष्णु और भगवान शंकर की शरण में गए। देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा है तथा देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा है।

ये बात सुन भगवान विष्णु और भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित हुए और उनके क्रोध के कारण एक महान तेज प्रकट हुआ। अन्य देवताओं के शरीर से भी एक तेजोमय शक्ति मिलकर उस तेज में मिल गई। यह तेजोमय शक्ति एक पहाड़ के समान थी जिसकी ज्वालाएं दसों-दिशाओं में फैल रही थीं। यह तेजपुंज सभी देवताओं के शरीर से प्रकट होने के कारण एक अलग ही स्वरूप लिए हुए था जिससे इस प्रकाश से तीनों लोक भर गए।

तभी भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख मंडल प्रकट हुआ। यमराज के तेज से देवी के बाल, भगवान विष्णु के तेज से देवी की भुजाएं, चंद्रमा के तेज से देवी के दोनों स्तन, इन्द के तेज से कटि और उदर प्रदेश, वरुण के तेज से देवी की जंघायें और ऊरू स्थल, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा जी के तेज से देवी के दोनों चरण और सूर्य के तेज से चरणों की उंगलियां, वसुओं के तेज से हाथों की उंगलियां तथा कुबेर के तेज से नासिका यानि नाक का निर्माण हुआ। प्रजापति के तेज से दांत, संध्याओं के तेज से दोनों भौएं और वायु के तेज से दोनों कानों का निर्माण हुआ और इस तरह से सभी देवताओं के तेज से एक कल्याणकारी देवी का प्रादुर्भाव हुआ। चूंकि इन देवी की उत्पत्ति महिषासुर के अंत के लिए हुई थी, इसलिए इन्हें 'महिषासुर मर्दिनी' कहा गया।

समस्त देवताओं के तेज पुंज से प्रकट हुई देवी को देखकर पीड़ित देवताओं की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। भगवान शिव ने शस्त्र के रूप में अपना त्रिशूल देवी को दिया। भगवान विष्णु ने भी अपना चक्र देवी को प्रदान किया। इसी प्रकार, सभी देवी-देवताओं ने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र देवी के हाथों में सजा दिये। इंद्र ने अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घंटा देवी को दिया गया। सूर्य ने अपने रोम कूपों और किरणों का तेज भरकर ढाल, तलवार और दिव्य सिंह यानि शेर को सवारी के लिए उस देवी को अर्पित कर दिया। विश्वकर्मा ने कई अभेद्य कवच और अस्त्र देकर महिषासुर मर्दिनी को सभी प्रकार के बड़े-छोटे अस्त्रों से शोभित किया।

अब बारी थी महिषासुर से युद्ध की। थोड़ी देर बाद महिषासुर ने देखा कि एक विशालकाय रूपवान स्त्री अनेक भुजाओं वाली और अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर शेर पर बैठकर अट्टहास कर रही है। महिषासुर की सेना का सेनापति आगे बढ़कर देवी के साथ युद्ध करने लगा। उदग्र नामक महादैत्य भी 60 हजार राक्षसों को लेकर इस युद्ध में कूद पड़ा। महानु नामक दैत्य एक करोड़ सैनिकों के साथ, अशीलोमा दैत्य पांच करोड़ और वास्कल नामक राक्षस 60 लाख सैनिकों के साथ युद्ध में कूद पड़े। सारे देवता इस महायुद्ध को बड़े कौतूहल से देख रहे थे।

दानवों के सभी अचूक अस्त्र-शस्त्र देवी के सामने बौने साबित हो रहे थे, लेकिन देवी भगवती अपने शस्त्रों से राक्षसों की सेना को निशाना बनाने लगीं। रणचंडिका देवी ने तलवार से सैकड़ों असुरों को एक ही झटके में मौत के घाट उतार दिया। कुछ राक्षस देवी के घंटे की आवाज से मोहित हो गए। देवी ने उन्हें तुरंत पृथ्वी पर घसीट कर मार डाला।

उधर, देवी का वाहन शेर भी क्रोधित होकर दहाड़ मारने लगा। वह राक्षसों की सेना से प्रचंड होकर इस तरह घूमने लगा, जैसे जंगल में आग लग गई हो। शेर की सांस से ही सैकड़ों हजारों गण पैदा हो गए। देवी ने असुर सेना का इस प्रकार संहार कर दिया, मानो तिनके और लकड़ी के ढेर में आग लगा दी गई हो। इस युद्ध में महिषासुर का वध तो हो ही गया, साथ में अनेक अन्य दैत्य भी मारे गए जिन्होंने लम्बे समय से आतंक फैला रखा था। मान्यता ये है कि महिषासुर के साथ माता दुर्गा का ये युद्ध नौ दिनों तक चला था और इसी वजह से माता दुर्गा की स्तुति करने के लिए ही नवरात्रि के इस त्यौहार को नौ दिनों तक मनाया जाता है।

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