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चीन के लोगों को इन्होंने पढ़ाया था नैतिकता का पाठ

👤 Admin2 user | Updated on:2017-02-10 11:54:01.0

चीन के लोगों को इन्होंने पढ़ाया था नैतिकता का पाठ

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भारत में भगवान महावीर और बुद्ध धर्म के संबध में नए विचार प्रसारित हो रहे थे। ठीक उसी समय चीन में भी एक सुधारक का जन्म हुआ, जिनका नाम था कन्फ़्यूशियस।

उस समय चीन में झोऊ राजवंश का बसंत और शरद काल चल रहा था। समय के साथ झोऊ राजवंश की शक्ति शिथिल पड़ने के कारण चीन में बहुत से राज्य कायम हो गए। यह सभी आपस में लड़ते रहते थे।

आलम यह हुआ कि लोगों ने झगड़ते राज्यों का काल कहना शुरु कर दिया था। चीनी लोग काफी परेशानियों में दिन गुजार रहे थे। प्रजा बहुत ही कष्ट झेल रही थी। ऐसे समय में चीन वासियों को नैतिकता का पाठ कन्फ्यूशियस ने ही पढ़ाया।

कनफ्यूशियस नीतिवादी समाज सुधारक थे। कनफ्यूशियस का लाओत्से से मिलना एक ऐतिहासिक घटना है। इसे अनेक इतिहासकारों ने बढ़ा-चढ़ाकर लिखा है। कनफ्यूशियस के ग्रंथ 'एनालेक्ट्स' में इस मिलन का संकेत है। जब कनफ्यूशियस लाओत्से से मिले तब उनकी उम्र 35 वर्ष और लाओत्से 88 वर्ष के थे।

कनफ्यूशियस का कहना था कि किसी देश में अच्छा शासन और शांति तभी स्थापित हो सकती है जब शासक, मंत्री तथा जनता का प्रत्येक व्यक्ति अपने स्थान पर उचित कर्तव्यों का पालन करता रहे।

कनफ्यूशियस से एक बार पूछा किसी ने पूछा, यदि आपको किसी प्रदेश के शासनसूत्र के संचालन का भार सौंपा जाए तो वह सबसे पहला कौन सा महत्वपूर्ण कार्य करेगा। इसके लिए उसका उत्तर था– 'नामों में सुधार'।

कनफ्यूशियस ने कभी इस बात का दावा नहीं किया कि उन्हें कोई दैवी शक्ति या ईश्वरीय संदेश प्राप्त होते थे। वह केवल इस बात का चिंतन करता था कि व्यक्ति क्या है और समाज में उसके कर्तव्य क्या हैं। उसने शक्तिप्रदर्शन, असाधारण शक्तियों, विद्रोह प्रवृत्ति तथा देवी देवताओं का जिक्र कभी नहीं किया।

उनका मत था कि जो मनुष्य, मानव की सेवा नहीं कर सकता वह देवी देवताओं की सेवा क्या करेगा। उसे अपने और दूसरों के सभी कर्तव्यों का पूर्ण ध्यान था, इसीलिए उसने कहा था कि बुरा आदमी कभी भी शासन करने के योग्य नहीं हो सकता, भले ही वह कितना भी शक्ति संपन्न हो।

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