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जब धर्मराज को इस बात ने उलझाया तो लेनी पड़ी कर्ण की शरण

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2017-01-17 09:54:14.0

जब धर्मराज को इस बात ने उलझाया तो लेनी पड़ी कर्ण की शरण

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बात उस समय की है जब महाभारत युद्ध नहीं हुआ था। महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ में राज कर रहे थे। वे दानवीर थे, जल्द ही उनके दान देने की चर्चा दूर-दूर के अनेकों देशों में फैल गई।

आलम यह हुआ कि दूर-दूर से उनके पास लोग दान लेने आते थे। वह कभी खाली हाथ नहीं जाते थे।

हुआ यूं कि एक बार द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण इंद्रप्रस्थ आए। तब युधिष्ठिर के अनुज भीम और अर्जुन ने बड़े भाई की प्रशंसा और उनके द्वारा दिए जा रहे दान की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा।

तब श्रीकृष्ण ने कहा, अर्जुन हमने तो कर्ण जैसा दानवीर आज तक नहीं सुना है। पांडवों को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। भीम में इसी बीच पूछा, 'वह कैसे?' श्रीकृष्ण बोले, 'मैं उचित समय आने पर यह बात बताऊंगा।'

सयम बीतता गया। बात आई-गई हो गई। तब कुछ दिन बाद श्रावण माह शुरू हुआ। युधिष्ठिर के पास एक याचक आया। वह बोला, मैं ब्राह्मण हूं। मैंने यह संकल्प लिया है कि बिना हवन किए बिना भोजन नहीं करता हूं। मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हों तो मुझे दान कर सकते हैं। नहीं तो मैं भूखा प्यासा ही मर जाउंगा। कुछ ही दिनों में सावन का माह शुरू हो गया और वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य का एक ब्राह्मण हूं । मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा।

युधिष्ठिर ने अपने कोषागार चलाने वालों से कहा, लेकिन उनके कोषागार में चंदन की लकड़ी नहीं थी। तब ब्राह्मण ने कहा, आपको मेरे साथ चलना होगा शायद वहां आपको चंदन की लकड़ी मिल जाए।

काफी खोजने के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तभी युधिष्ठिर और ब्राह्मण की भेंट श्रीकृष्ण से हुई तब उन्होंने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ।

ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई। भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया। वेश बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग हो लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेश में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं।

याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ। ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे।

तभी कर्ण ने कहा, हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास। उन्‍होंने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दिया, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया।

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