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मन और वाणी को संयमित करना अनुशासन है

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2017-01-09 09:39:44.0

मन और वाणी को संयमित करना अनुशासन है

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अनुशासन का अर्थ है नियम के अंतर्गत चलना। अब प्रश्न है कि नियम क्या है? नियम नैतिकता को कहते हैं और नैतिकता, सरलता और सुगमता को कहा जाता है। यह जो नीति शब्द है वह 'ऋत' से बना है। 'ऋत' का अर्थ है जो सरल और सुगम हो। यही शब्द आगे चलकर 'ऋत' बना और 'ऋत' से ही नीति बन गया। नैतिकता इसी नीति से बना हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है, जीवन में सरल और सुगम बनना।

प्रत्येक मनुष्य जन्म से ही सरल और सुगम होता है। बचपन में कोई विकार नहीं होता। इसलिए बचपन सब को प्यारा लगता है। लेकिन मनुष्य जब बड़ा हो जाता है, तो विकारग्रस्त बन जाता है। उसमें बुराइयां आ जाती हैं। इसी बुराई से बचने के लिए संयम, नियम और अनुशासन की आवश्यकता पड़ती है। अनुशासन दो प्रकार के होते हैं-एक बाहर का अनुशासन और दूसरा अंतर्मन का अनुशासन। बाहर का अनुशासन दिखावटी होता है और भीतर का अनुशासन मौलिक होता है। बाहर के अनुशासन के लिए हम व्यायाम करते हैं, लेकिन भीतर के अनुशासन के लिए हमें प्राणायाम करना पड़ता है। भीतर का अनुशासन तभी आता है, जब मन में उठ रहे काम और क्रोध के वेग को प्राणायाम से नियंत्रित किया जाए। अंतर्मन के अनुशासन के लिए प्राणायाम के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अंतर्मन की क्रिया को बाहर से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। जीवन में अनुशासन आए, यह अच्छी बात है, लेकिन अनुशासन भीतर का हो, बाहर के अनुशासन से भीतर को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है।

अनुशासन तो भीतर से आना चाहिए। अगर कोई छात्र टीचर के भय से अथवा कमांडर के भय से सीधा खड़ा है, तो वह अनुशासन में नहीं है, वह भय के कारण अनुशासन में दिख रहा है। इसलिए जहां भय होगा, वहां अनुशासन नहीं हो सकता। पतंजलि ने संयम, नियम और आसन की बात की है। संयमपूर्वक नियम का पालन ही अनुशासन है। जो भीतर से नियम का पालन करे, जिसका मन सरल बन जाए, विकार मुक्त हो जाए, जो काम क्रोध और अहंकार से प्रभावित न हो, उसे ही अनुशासित कहते हैं।

हाथ-पांव सीधे करके खड़ा होना अनुशासन नहीं है, मन और वाणी को संयमित करना अनुशासन है। हम सभी चाहते हैं कि हमारा जीवन संयम, नियम और अनुशासन के अंतर्गत चले। इसका मतलब है कि हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे लोक-मर्यादा भंग हो।

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