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ईश्वर सच में है या नहीं यदि है तो कहां है, कैसा है?

👤 A2ZNews Channel | Updated on:2017-01-09 09:27:08.0

ईश्वर सच में है या नहीं यदि है तो कहां है, कैसा है?

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अनेक लोगों के दृष्टिकोण में ईश्वर के अस्तित्व को जानने की जिज्ञासा रखना अपने आप में एक व्यर्थ का

तर्क-वितर्कया व्यर्थ का विवाद हो सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ईश्वर शब्द की विवेचना करना बेहद निजी मामला है और यह धर्म से जुड़ा है और धर्म आस्था से, परंतु इस प्रकरण के संदर्भ में गहरे चिंतन-मनन की आवश्यकता है।

ऐसा बहुत कम देखा गया है कि लोग पूर्णत: नास्तिक हों। उनके अंदर ईश्वर के अस्तित्व को लेकर हमेशा उहापोह चलता रहता है। हम सभी सामाजिक प्राणी हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी धर्म व समाज से जुड़े हैं, जीवन यात्रा में थोड़ी बहुत फेरबदल होती रहती है। समझ आते ही साधारणत: ईश्वर के अस्तित्व का आभास परिवार व समाज द्वारा कराया जाने लगता है। कोई धार्मिक ग्रंथ पढ़कर, दिया-बाती जलाकर, घंटी बजाकर तो कोई व्रत त्योहार के प्रयोजन से अपने को ईश्वर के समीप पाता है, लेकिन ये साधन क्या सच में ईश्वर के अस्तित्व को पहचानने में साधक हैं? यह समय के साथ- साथ मनुष्य के अंदर धीरे-धीरे विकसित होता है। एक बौद्धिक स्तर से परिपक्व व्यक्ति के लिए यह प्रश्न गूढ़ चिंतन का विषय हो सकता है।

ईश्वर सच में है या नहीं? यदि है तो कहां है, कैसा है, तो दिखता क्यों नहीं? वह निर्गुण है कि सगुण, इस तरह के अनेक प्रश्न उजागर होते हैं, जिनके उत्तर की खोज मनुष्य को उलझाकर रख देती है। पूरे संसार में हम सभी अपने-अपने ईश्वर को अनेकानेक रूपों में पूजते आ रहे हैं। यह बात तो निश्चित है कि प्रत्येक धर्म व धार्मिक ग्रंथ एक ही बात दोहराते हैं कि भलाई के पथ पर चलें, गुणवान व्यक्ति बनें, पर हममें से कितने इन बातों का अनुसरण कर पाते हैं? जाने या अनजाने ऐसा क्यों है कि ईश्वर के अस्तित्व के आभास को हम अपनी सुविधा मान लेते हैं। यानी ईश्वर न देखा गया, न सुना गया, पर उसका होना हम मान बैठे हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि यदि ईश्वर है तो वह ऐसी शक्ति है, जो हमें अवांछित और अनैतिक कर्मों से दूर रखती है। वह ईश्वर हमारे अंतर्मन में भी है और बाहर भी। जो सब में समाया है, कण-कण में व्याप्त है। ईश्वर के संदर्भ में हमारी ये मान्यताएं हैं, विश्वास है, उत्साह है और हमारा अधिकार भी है। वही तो है जो हमारे उत्सवों में शामिल है। वह नित्य-नित्यानंद है। ईश्वर हमारी मन की उलझनों का निवारण करता है और हमारे मोक्ष का कारण बनता है। हमें अपने मन की अशांति को दूर करने के लिए उस ईश्वरीय शक्ति का सहारा लेना चाहिए जो हर समय हमारे साथ है।

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