एटमी डील को लग सकता है धक्का
Thursday, 2nd September 2010
दक्षिण एशियाई मामलों की एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने भारतीय संसद द्वारा पारित परमाणु दायित्व विधेयक कुछ खामियों की ओर इशारा करते हुए कहा है कि इसका दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक एटमी करार पर विपरीत असर पड़ सकता है। इस विधेयक के पारित होने से अमेरिका समेत अन्य देशों की कंपनियों के भारत के परमाणु कारोबार में निवेश करने के रास्ते खुल गए हैं। हालांकि इस विधेयक पर अमेरिका की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
अमेरिकी विशेषज्ञ ने जताई आशंका-वाशिंगटन में दक्षिण एशियाई मामलों के एक थिंक टैंक ‘द हेरिटेज फाउंडेशन’ में सीनियर रिसर्च फेलो लीसा कर्टिस ने कहा, उम्मीद की जा रही थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही पूरा करने वाला परमाणु दायित्व विधेयक अमेरिकी निवेश के रास्ते खोल देगा और यह द्विपक्षीय परमाणु समझौता पूरा होने की दिशा में आखिरी कदम माना जा रहा था। कर्टिस ने इसे भारत-अमेरिका के बीच एटमी डील के लिए नई रुकावट बताते हुए कहा कि भारतीय वाणिज्य समूहों ने भी इस बिल की निंदा की है। एक लेख में कर्टिस ने कहा कि अमेरिकी नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने पारित विधेयक में परमाणु व्यापार के अंतरराष्ट्रीय मानकों से असंगत भाषा के इस्तेमाल के बावजूद उस पर सुरक्षात्मक रुख अपनाया है।ओबामा की यात्रा मतभेद दूर करने का सुनहरा मौका-विधेयक में संयंत्र के निर्माण के 80 साल बाद तक किसी अनचाही दुर्घटना के लिए उपकरणों, कच्चे माल और सेवा उपलब्ध कराने वाले आपूर्तिकर्ताओं को जवाबदेह बनाया गया है। कर्टिस के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की नवंबर में भारत यात्रा एक अनुकूल अवसर है जब दोनों देश तमाम मुद्दों पर कायम मतभेदों को दूर कर लें। हालांकि उन्होंने इस बात को माना कि एक वास्तविक प्रजातंत्र की विदेश नीति पर घरेलू राजनीति का असर पड़ता है लेकिन दोनों देशों को स्थानीय दबावों से इससे ऊपर उठकर द्विपक्षीय साझेदारी बढ़ानी होगी। लेकिन शीर्ष 300 अमेरिकी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल ने भारत से कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के ‘पूरक मुआवजा संबंधी मानकों’ के अनुरूप परमाणु दायित्व व्यवस्था कायम करे।
कर्टिस ने कहा, ‘आगामी वर्षों में भारत में कई परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की उम्मीद लगाए रूस ने भी कथित तौर पर भारतीय अधिकारियों से कहा है कि वह परमाणु क्षेत्र को उपकरण और अन्य सामग्री मुहैया कराने को लेकर लागू कोई जिम्मेदारी स्वीकार नहीं करेगा। यह समस्या परमाणु ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण पर दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद पैदा हुई है। इसमें भारत को परमाणु ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण की सुविधा दी गई है। उनके मुताबिक कुछ दिनों पहले अमेरिकी कांग्रेस ने एक विधेयक पारित किया था जिसमें भारतीय कंपनियों पर भारी बोझ डाला गया है और इसके बाद भारत की संसद ने तमाम संशोधनों के साथ परमाणु दायित्व विधेयक को मंजूरी दी।
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